रिपोर्ट – ‘क्वियर आज़ादी मुंबई’ प्रस्तुत ‘Q Fest’

‘क्वियर आज़ादी मुंबई’ अपनी प्राइड-मार्च यानि सम्मान-यात्रा से पूर्व एक महीना “सम्मान-माह” मनाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम और उपक्रमों का आयोजन होता है । इस वर्ष के सम्मान-माह का प्रारम्भ “Q Fest” उत्सव के साथ हुआ जिसे क्वियर तथा अन्य समुदायों ने बड़ी उमंग से हिस्सा लेकर सफल किया ।

14 दिसंबर 2014 को दोपहर 3 बजे से रात 10.30 बजे तक, खार पश्चिम के चुइम गाँव में स्थित “द हाइव” में “Q Fest” सम्पन्न हुआ । मुंबई की जानी-मानी प्रकाशन संस्था ‘क्वियर इंक’, मुंबई के क्वियर समुदाय की एक सहयोगी संस्था ‘गे बॉम्बे’ तथा खार पश्चिम की संस्था ‘द हाइव’ ने इस उत्सव के आयोजन में सहयोग दिया । पुस्तकें तथा कलात्मक वस्तुओंकी पैंठ, फ़िल्म-प्रदर्शन, वर्कशाप तथा मंचप्रयोगों में रसिक अभ्यागतों ने आनंद बटोरते हुए इस उत्सव में स्वतंत्रता, समानता व स्वाभिमान को उजागर किया ।

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“Q Fest” ने अभ्यागतों का स्वागत करते हुए एक ‘मेला’ आयोजित किया था जिसमें तरह-तरह की आकर्षक वस्तुओं का विक्रय हुआ । क्वियर इंक के स्टाल पर बहुत सारी पुस्तकें तथा विभिन्न बैजेस के साथ ‘लुमिएर आर्ट अँड क्राफ्ट’ के भेंट-कार्ड, पर्स, एक्सेसरी आदि उपलब्ध थे । गे बॉम्बे के स्टॉल पर ‘क्वियर-कला’ के सुमित और विनय ने हस्तकला की बहुत सारी कलात्मक वस्तुएँ विक्रय के लिए प्रदर्शित की थीं । अन्य एक स्टॉल पर आकर्षक रंग-रूप और आकार की मोमबत्तियों का प्रदर्शन व विक्रय हो रहा था । अभ्यागतों ने इस मेले में ख़रीदारी का ख़ूब मज़ा लूटा ।

क्वियर इंक फ़िल्म क्लब द्वारा अयोजित “XXYY” नामक फ़िल्म का प्रदर्शन न केवल रंजक बल्कि प्रेरक और जिज्ञासाजनक भी रहा । 15 वर्ष उम्र की एक इंटरसेक्स लड़की अपनी यौनिकता को स्वीकार करते हुए जिस संघर्ष से गुज़रती है, उसके परिवार को जिस तनाव का सामना करना पड़ता है और अंत में अपनी पहचान बनान के लिए वह किस प्रकार से निर्णय करती है यह देखना दर्शकों के लिए एक अनोखा और भारी अनुभव रहा । यौनिकता से संबंधित कुछ सवलों का जवाब देते हुए इस फ़िल्म ने कुछ नए सवाल भी उठाए जिनके जवाब हमें अपने आप ढूँढने होंगे ।

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विरामकाल में चाय-कॉफी-सैंडविच खाते हुए, पैंठ के स्टालों पर नज़र डालते हुए दर्शक इन सवालों से झूँझ ही रहे थे, कि वक्त हो गया ‘गे बॉम्बे’ द्वारा आयोजित उस वर्कशाप का जिसके संचालक थे क्वियर समुदाय के जाने-माने मनोवैज्ञानिक दीपक काश्यप । वर्कशाप का नाम था ‘आय लव माय बॉडी’ । विषय बहुत ही मार्मिक था । पिछले दो दशकों में मीडिया, फ़िल्म, मैगज़ीन, आदि के द्वारा ‘मेट्रोसेक्शुअल’ की परिभाषा से भूषित एक गोरे-ऊँचे-पेशीदार-हट्टे-कट्टे-पौरुष से भरे शरीर की प्रतिमा का इतना उदात्तीकरण हुआ है कि हर एक सामान्य व्यक्ति अपने आप को उसी आदर्श से तौलता है और स्वयं को उसी ढाँचे में ढालने की कोशिश करता है । उसके मन में अपने शरीरमान को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा होती है, जिससे उसका आत्मविश्वास और अत्मसम्मान कम हो जाता है । इसका असर उसके यौनसंबंधों और प्रेम-संबंधों पर भी पड़ता है । शरीर-प्रतिमा की उलझन में उलझे हमारे दर्शकों के लिए यह वर्कशाप एक नेत्रांजन साबित हुआ । लगभग 7.30 बजे तक चले इस वर्कशापमें साठ से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया, जिन में से कुछ व्यक्ति स्ट्रेट भी थे ।

परिचर्चा, गोष्ठी, आदि के बाद अर्थात समय था कुछ हलके-फुलके रंगरंगीले मनोरंजन का और इसमें भी “Q Fest” के आयोजकों ने एक मनोरंजन का पूरा पैकेज प्लान कर रखा था जिसका नाम था ‘रेनबो माइक’ ।

रेनबो माइक में शुरू में उनाइज़ा मर्चंट और सर्वेश तलरेजा के मंचप्रयोगों ने दर्शकों की तारीफ़ पाई । गिटार-वादक व गायक निखिल डि’सोज़ा की संगीतरचनाओं पर श्रोतागण खुश थे । क्रिस्टबेल मेंनेज़िस की, हाथ से पेंटिंग की हुई छोटीसी गिटार ने तो देखते ही लोगोंका दिल जीत लिया । गिटार की तारों पर सुर लगाते और उसके तुंबे पर ठेका लेते हुए क्रिस्टबेल ने अपनी दर्दभरी आवाज़ में कुछ ऐसे गीत गाए कि लोगों ने सुरों के साथ उस दर्द को भी अपना लिया ।

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फिर आए मुंबई के ही नौजवान व्यंगकार नवीन नोरोन्हा । उन्होंने आते ही अपने क्रिश्चन और गे होने के बावजूद अपने नॉर्मल होने का कुछ ऐसा ऐलान कर दिया कि सभी लोग अपनी कुर्सियाँ पकड़कर बैठ गए । दर्शकों को कभी गुदगुदी करते तो कभी चुटकुली लगाते, रोज़ाना ज़िंदगी की बिलकुल सामान्य लगने वाली छोटी-मोटी घटनाओं को उन्होंने कुछ इस ढंग से पेश किया कि दर्शक हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए ।

इनके बाद आईं रोशेल डि’सोज़ा जिन्होंने अपनी इंग्लिश कविताएँ पढ़ीं । भारत में जन्मी रोशेल ने डेढ़ से अधिक दशक विदेश में बिताया है और हाल ही में वे भारत लौट आईं हैं । अपनी भारतीय पहचान को वापस ढूँढते हुए, घर बसा लेने की माता-पिता की उमीदों से लड़ते हुए और एक महिला होने के कारण समाज उनसे जो अपेक्षाएँ रखता है उनसे उनका जो संघर्ष चलता है उसे रोशेल ने बख़ूबी अपनी कविताओं में चित्रित किया ।

लेकिन श्रोताओं की भावनाओं को सही आवाज़ देते हुए उनके दिलों को अगर किसी ने जीत लिया तो वे थे जम्मू-कश्मीर के युवा कवि रमणीक सिंह । रमणीक दो वर्षों से मुंबई में कविता के क्षेत्र में करियर बनाने की कोशिश कर रहे हैं । इनकी सारभरी हिंदी कविताओं ने इस स्थल, काल और तत्त्व को उचित रूप से अपने शब्दों में उजागर किया । एक समझधार, संवेदनशील और शांति-प्रिय इन्सान की इस आधुनिक अशांति के युग में जो घुटन होती है उसे उन्होंने बहुत प्रभावपूर्ण शब्दों में और सरल रीति में प्रस्तुत किया ।

‘Q Fest’ के आख़री मंचप्रयोग में हिंदुस्थानी शास्त्रीय गायन के द्वारा इस उत्सव को चरमसीमा तक पहुँचाया युवा गायक सौरभ और सुरूप तबला-वादक सात्त्विक ने । सौरभ ने राग बृन्दावनी सारंग में विलंबित एकताल में स्वरचित बंदिश और मध्य तीनताल में पारंपरिक बंदिश प्रस्तुत की । फिर यमन राग में मध्यलय तीनताल में ‘सखि एरी आली पिया बिन’ इस प्रसिद्ध बंदिश से शुरू कर लय बढ़ाते हुए उन्होंने द्रुत लय में तराना गाया । सात्त्विक के बनारस अंग की तिहाइयों और लग्घियों ने आलाप, बोल-आलाप और तानों का मज़ा दुगना किया । कार्यक्रम का समापन सौरभ ने मध्यम स्वर में ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ इस मीरा-भजन से किया जिसे रसिकों ने दिल से सराहा ।

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क्वियर आज़ादी मुंबई को बड़ी ख़ुशी हो रही है कि इस साल ‘सम्मान-माह’ का आरंभ विभिन्न कार्यक्रमों से भरे एक बहुतही दिलचस्प ‘Q Fest’ उत्सव से हुआ । इस उत्सव में बड़े उत्साह और चेतना से हिस्सा लेनेवाले सभी अभ्यागतों का हम तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हैं और विश्वास करते हैं कि आगे आनेवाले सभी उपक्रमों में हमें आपका इससे भी अधिक सहयोग व आश्रय मिलेगा । हमारा अगला कार्यक्रम, ‘यारियाँ’ द्वारा आयोजित ‘Queer Games’ क्रीडा-उत्सव, रविवार 04 जनवरी 2015 को शाम 4 बजे से जुहू चौपाटी, सांताक्रूज़, मुंबई में सम्पन्न होगा ।

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